सरकार गिरने के बाद अब कांग्रेस संगठन में जल्द होगा बदलाव

भोपाल । कांग्रेस के बड़े से बड़े पदाधिकारी से लेकर नीचे के कार्यकर्ता तक मानते हैं कि संगठन में पूर्णकालिक प्रदेश अध्यक्ष के नहीं होने से भाजपा की साजिश का सामना नहीं किया जा सका।वहीं, प्रदेश में खेमों में बंटी कांग्रेस के प्रमुखों के बीच अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी समन्वय स्थापित नहीं कर पाई और प्रभारी महासचिव दीपक बाबरिया से भी इन नेताओं की दूरियां बनी रहीं। अब संगठन में प्रदेश अध्यक्ष ही नहीं प्रभारी महासचिव को लेकर भी फैसला हो सकता है। हालांकि कोरोना वायरस संक्रमण फैलाव पर नियंत्रण होने तक इन निर्णयों को लंबित रखे जाने की संभावना है। मध्यप्रदेश कांग्रेस में 23 महीने पहले कमल नाथ को संगठन की कमान सौंपकर भेजा गया था। उनके छह महीने पहले अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने प्रभारी महासचिव मोहन प्रकाश के स्थान पर दीपक बाबरिया को भेजा था। कमल नाथ ने मई 2018 में संगठन की जिम्मेदारी संभाली और आज तक वे प्रदेश अध्यक्ष हैं। 23 महीने में से कमल नाथ 15 महीने सरकार में होने से संगठन की तरफ ध्यान ही नहीं दे पाए और उन्हें संगठन के लिए आठ महीने मिले, तब वे चुनाव के मोड में काम करते रहे। इस पूरी अवधि में कांग्रेस के संविधान के मुताबिक हर तीन महीने में होने वाली प्रदेश कांग्रेस की कार्यसमिति की एक भी बैठक नहीं हुई।


 

असीमित पदाधिकारी बनाने से संगठन कमजोर


विधानसभा और लोकसभा चुनाव में असंतुष्टों को असीमित पद बांटे जाने से संगठन कमजोर होने के आरोप लगाए गए। दोनों चुनावों में जितने दावेदार थे, लगभग सभी को संगठन में महासचिव, सचिव बना दिया गया। एक व्यक्ति को दो से तीन पद मिल गए। इसकी मुख्य वजह दो-तीन स्तर पर पदों की बंदरबाट हुई। इसका नतीजा यह हुआ कि प्रदेश कांग्रेस कमेटी में किस नेता को कौन-सा पद दिया गया, इसका कोई रिकॉर्ड तक नहीं रखा गया। इसमें भी छोटे कार्यकर्ताओं को कुछ हासिल नहीं हुआ। कमजोर संगठन की वजह से सरकार के खिलाफ भाजपा की साजिश का काउंटर करने में कांग्रेस नाकाम रही।


 

सत्ता-समन्वय में कमी


कांग्रेस की सरकार के गिरने और पीसीसी के कमजोर होने में संवादहीनता को प्रमुख कारण बताया जा रहा है। यह आरोप बागी विधायकों ने खुलकर लगाए हैं और कई पार्टी पदाधिकारी भी दबी जुबान से यह बातें कहते रहे हैं। दूसरा कारण सत्ता-संगठन के बीच समन्वय की कमी भी बताई गई। इसके लिए प्रदेश में कांग्रेस की गुटबाजी भी जिम्मेदार रही है। मुख्यमंत्री कमल नाथ, दिग्विजय सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया, अजय सिंह जैसे नेताओं के बीच अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव और प्रदेश प्रभारी दीपक बाबरिया समन्वय नहीं बैठा पाए। इस गुटबाजी की वजह से बाबरिया अपने फार्मूलों पर अमल नहीं करा पाए। उन्हें कुछ स्थानों पर तो गुटीय राजनीति के कारण असंतोष का भी सामना करना पड़ा था।


संगठन में छोटे कार्यकर्ताओं का मनोबल वैसा नहीं था, जिससे भाजपा के षड्यंत्र का काउंटर किया जा सके। संवादहीनता को दूर करने के लिए कोई सिस्टम नहीं बन पाने से अपनी कार्ययोजना को अमल नहीं करवा सके।


दीपक बाबरिया, महासचिव व प्रदेश प्रभारी, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी