बच्चों ने तोड़ा गैजेट्स से मोह, सुनीं दादा-दादी से रोचक कहानियां

ग्वालियर । स्पर्धा और भागदौड़ भरी जिंदगी ने सभी को व्यस्त कर दिया है। पैरेंट्स अपने बच्चों को समय नहीं दे पा रहे हैं। तो बच्चों ने भी अपने दादा-दादी के साथ वक्त बिताने के बजाय गैजेट्स से दोस्ती कर ली है। लेकिन कोरोना के डर ने अब परिवारों को संगठित कर दिया है। बिखरने वाले परिवार से जुड़े सदस्य एक दूसरे से वीडियो या ऑडियो कॉल से नजदीक आ रहा हैं। बच्चे घंटों दादा-दादी के पास बैठकर रोचक कहानियां सुन रहे हैं। शिंदे की छावनी क्षेत्र में रहने वाले बुजुर्ग महेन्द्र सिंह कहते हैं भले ही कहानियां काल्पनिक हों, मगर इनमें कहीं न कहीं संस्कार छिपे होते हैं। मगरमच्छ और बंदर की कहानी सभी ने रोचकता से सुनी, साथ ही इसमें छिपे 'भरोसे' के संदेश को भी आत्मसात किया। इसी तरह तानसेन नगर में रहने वाले आरडी आर्य कहते हैं 90 के दशत तक कई कहानियां बच्चों को सुनाई जाती रही हैं, लेकिन इसके बाद हावी हुई तकनीक ने जैसे सब कुछ खत्म सा कर दिया है। महाभारत का संदेश और विक्रम-बेताल की कहानी एक बार से जुबां पर आने से पुराना समय याद आ रहा है।


 

कहानियों से बच्चों को मिलेगा यह फायदा


कई कहानियां दैनिक चर्चा के दौरान उदाहरण बनती हैं। इससे बच्चों की शब्दावली बढ़ेगी। वे सिर्फ किताबों से ही नहीं सीखेंगे। खास बात यह कहानी सुनते समय अगर बच्चों को कोई शब्द समझ में नहीं आता है तो वे अपने दादा या दादी से उसका मतलब पूछते हैं। शब्दप्रताप आश्रम क्षेत्र में रहने वाले रामअवतार सिंह ने अपने बेटे के बच्चों को घर से बाहर न निकलने के बदले उन्हें अकबर और बीरबल की कहानियां सुनाई। उन्होंने बच्चों की रोचकता बढ़ाने के लिए हर लाइन का अर्थ भी बताया। इसी तरह गोला का मंदिर क्षेत्र में रहने वाले विकास सिंह ने अपने भतीजों के साथ वक्त बिताने के लिए पूरे दिन केरम खेला। उनसे कहा गया कि वे मोबाइल गेम के बजाय घर में ही कोई न कोई गेम खेलें। इसमें उनका साथ वे खुद देंगे, उन्होंने ऐसा किया भी।