15 दिन में तैयार किया गया तिरिछ, दिखाई 400 साल पुरानी रामकथा

भोपाल । शहीद भवन में पांच दिवसीय रंग त्रिवेणी नाट्य उत्सव के तहत रविवार की शाम दो नाटकों की प्रस्तुति हुई। पहली प्रस्तुति रही नाटक तिरिछ, जिसमें एक पिता के दर्द की कहानी है। लेखक उदय प्रकाश लिखित कहानी की परिकल्पना, निर्देशन और अभिनय ओम द्विवेदी का रहा। कहानी के विषय में ओम कहते हैं कि यह मैंने बहुत पहले पढ़ी थी और करने की इच्छा थी लेकिन साहस नहीं था। क्योंकि इसे करने के लिए जो तैयारी और संवेदना की जरूरत थी वो शायद नहीं थी। यह कहानी की पहली प्रस्तुति रही, जिसे मैंने 15 दिन में तैयार किया। दूसरी प्रस्तुति थी ओरछाधीश, जो कि 400 वर्ष पुरानी श्रीराम की कथा को पेश किया गया है। स्कंद मिश्रा के नाट्य रूपांतरण को अनूप शर्मा के निर्देशन में पेश किया गया।


तरह-तरह के तिरिछ से कराया रूबरू


एक घंटे की प्रस्तुति 'तिरिछ', एक ऐसे बेटे की कहानी है, जो अपने पिता के दर्द का किस्सा सुनाता है। (तिरिछ एक जानवर होता है, जो मगरमच्छ से छोटा और छिपकली से बड़ा होता है)। गांव में रहने वाले व्यक्ति को जंगल में तिरिछ काट लेता है और ऐसा माना जाता है कि जिसे तिरिछ काटता है वो बचता नहीं है। बेटा पिता को शहर ले आता है लेकिन वे बच नहीं पाते। यहां यह दिखाने का प्रयास किया गया, कि व्यक्ति की जान उस जानवर के काटने से नहीं बल्कि शहर के दिए गए तरह-तरह के 'तिरिछ' से जाती है। इसमें अंधविश्वास, व्यवस्था और शहरीकरण आदि शामिल हैं। यूं तिरिछ एक सच है और तिरिछ को लेकर ग्रामीण समुदाय में जितने तरह के विश्वास प्रचलित हैं, वे भी इस कहानी में बहुत सघनता के साथ आए हैं, लेकिन कहानी में कई ऐसे तिरिछों का आगमन भी होता है, जो पिता की जान ले लेते हैं। अदालती सम्मन का तिरिछ और अदालत पहुंचने के दौरान मिले अपमान, तिरस्कार, शहरी लोगों के संदेहास्पद व्यवहार और अवैज्ञानिक किस्म की चिकित्सा के तिरिछ।


 

तिरिछ जंगल से गायब होकर शहर आ गया


कहानी के अंत में पुत्र अपने स्वप्नों का एक रहस्य खोल देता है और वही दरअसल तिरिछ का सूत्र है कि पुत्र असल में जंगल में नहीं शहर में है और ठीक उसी हालत में है, जिससे गुजरकर पिता मारे गए यानी असल तिरिछ जंगल से गायब होकर शहर में आ गया है। वह कई रूपों में फैल गया है। शहरों ने जिस तरह गांवों को लील लिया है और जंगलों को साफ कर दिया गया है, ऐसे हालात में सामान्य आदमी को दर-दर की ठोकरें खाकर अपमान और तिरस्कार के तिरिछों के काटे से मरना पड़ता है। आप चाहे जितना उनका सिर कुचल दो, असल तिरिछ से आप बच भी जाएंगे, लेकिन ये शहरी तिरिछ आपको कभी नहीं छोड़ेंगे।


 

भक्तिमार्ग और आस्था


नाटक में ओरछाधीश की लगभग 400 वर्ष पूर्व की कथा है। लोककथाओं में श्रीराम के वनवास के समय राम कौशल्या को अपनी प्रतिकिृति भेंट करके जाते है कि इस रूप में मैं आपके पास ही रहूंगा। वहीं दशरथ अंतिम अवस्था को प्राप्त होते है और भगवान विष्णु की प्रार्थना करते हैं। दशरथ के अवतार ओरछा में राजा मधुकर शाह का विवाह काशी नरेश अनिरूद्ध सिंह परमार की सुपुत्री कौशल्या के अवतार गणेश कुंवरि के साथ होता है। मधुकर शाह एवं रानी गणेश कुंवरि के अलग-अलग भक्तिमार्ग और आस्था है। इसमें मधुकर शाह श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त हैं तो गणेश कुंवरि राम की अनन्य भक्त है। गणेश कुंवरि राम को लेने महल छोड़ वन चली जाती है। श्रीराम के दर्शन नहीं होने पर सरयू नदी में कूद कर प्राण देने का प्रयास करती है और राम स्वरूप को पाकर वो ओरछा नगरी आती है।


लाइट इफैक्ट के साथ दिखाए अवतार


इस प्रस्तुति में भगवान विष्णु अवतार को दिखाने के लिए एक इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस का उपयोग किया गया। इसमें एक चक्र है जैसे ही चक्र पर लाइट का इफैक्ट जाता है तो चक्र केआसपास धुए से भगवान विष्णु को दिखाया गया। इसी के साथ नाटक में बुदेलखंड के बधाई नृत्य और राई को प्रस्तुत किया गया है। नाटक में रामस्तुति और रामअवतार को गीतों पर आधारित कहानी को सुनाने का प्रयास किया गया है।